Sunday, April 4, 2010

ओ री दुनिया

ओ री दुनिया ऽ
ओ री दुनिया ऽ
ए ओ री दुनिया ऽ ऽ


सुरमई आँखों के प्यालों की दुनिया, ओ दुनिया ऽ (२)
सतरंगी रंगों गुलालों की दुनिया, ओ दुनिया ऽ (२)

अलसाई सेजों के फुलों की दुनिया, ओ दुनिया रे
अंगडाई तोडे कबूतर की दुनिया, ओ दुनिया रे


करवट ले सोयी हक़ीकत की दुनिया, ओ दुनिया ऽ
दीवानी होती तबीयत की दुनिया, ओ दुनिया ऽ
ख़्वाइश में लिपटी ज़रूरत की दुनिया, ओ दुनिया रे
इंसाँ के सपनों की नियत की दुनिया, ओ दुनिया ऽ

ओ री दुनिया ऽ हाँ ऽ, ओ री दुनिया ऽ ऽ (२)

ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है (२)
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

ममता की बिखरी कहानी की दुनिया, ओ दुनिया ऽ
बहनों की सिसकी जवानी की दुनिया, ओ दुनिया ऽ
आदम के हव्वा से रिश्ते की दुनिया, ओ दुनिया रे
शायर के फीके लब्जों की दुनिया, ओ दुनिया ऽ

ओ ऽ ऽऽ ऽऽ (२)
 
॥ग़ालिब के मोमिन के  ख़्वाबों की दुनिया
   मजाज़ों के उन इंकलाबों की दुनिया ॥ (२)

फैज़, फिराकों, सहिर ओ मख़दूम
मिर की झ़ौक की दाग़ों की दुनिया

ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है (२)
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है (१)

पल छिन में बातें  चली जाती हैंं, पल छिन में रातें  चली जाती हैं
रह जाता है जो सवेराऽ वो  ढूँढे, जलते मकाँ में बसेराऽ वो ढूँढे
जैसी बची है, वैसी की वैसी बचा लो ये दुनिया ऽ
अपना समज के अपनों के जैसी उठा लो ये दुनिया ऽ

चुटपुट सी बातों में जलने लगेगी, सम्हालो ये दुनिया ऽ
कट पिट के रातों में पलने लगेगी,  सम्हालो  ये दुनिया ऽ 

ओ री दुनिया ऽऽऽ (२)

वो कहें हैं की दुनिया ये इतनी नहीं हैं, सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
ये हम ही नहीं है वहाँ और भी हैं, हमारी हर इक बात होती वही है
हमें ऐतराज़ नहीं हैं कहीं भी, वो आलिम हैं फाज़िल हैं होंगे सही ही
मगर फलसफ़ा ये बिगड़ जाता, है जो वो कहते हैं ऽ ऽ

आलिम ये कहता वहा ईश्वर है
फाज़िल ये कहता वहा अल्लाह है
काबिल* ये कहता वहा ईसा  है

मंज़िल ये कहती तब इंसान से की, तुम्हारी है तुम ही सम्हालो ये दुनिया ऽ
ये बुझते हुए चंद बासी चराग़ों, तुम्हारे ये काले इरादों की दुनिया ऽ ऽ

ए ओ री दुनिया ऽ
ओ री दुनिया ऽ
ओ री दुनिया ऽ


अजून एका माझ्या सर्वांत आवडलेल्या गाण्यापैकी (आणि सर्वांत आवडलेल्या सिनेमांपैकी एकातून) एका गाण्याचे बोल. 'गुलाल'  या चित्रपटातील या गीतात अनेक उर्दू शब्द आहेत जे मला कळाले नाहीत, आणि म्हणून चुकीचे असतील, त्याबद्दल क्षमस्व! काही शब्द चुकीचे लिहिले गेले आहेत, ते तांत्रिक अडचणींमुळे. असो, 'अप्रतीम असे एक प्रखर गीत' एव्हढेच या गीताबद्दल मी म्हणेन.

Friday, February 5, 2010

नटरंग उभा

थुमकिट थुमकिट तदान् धुमकिट
नटनागर नट हिमनट पर्वत
उभा उत्तुंग नवा घुमतो मृदंग


पखवाज देत आवाज झनन् झंकार 
लेऊनी स्त्रीरुप भुलवी नटरंग नटरंग नटरंग 


रसिक होऊ दे दंग, चढू दे
रंग असा खेळाऽऽऽलाऽ
साता जन्माची देवा पुण्याई
लागू दे आज पणाऽऽऽलाऽ

हात जोडतो आज आम्हाला
प्राण तुझा दे सं ऽऽऽगऽ
  
नटरंग उभा, ललकारी नभा
स्वरताल जाहले दंग (२)



हे, कडकड कडकड बोल बोलती 
हुंगर ही तालाची
अरं, छुमछुम छन् नन् साथ तिला 
या घुंगराच्या बोलाची
जमवून असा स्वरसाज मांडतो
हीच ईनंती यावं जी

किरपेचं दान: द्यावं जी
हे यावं जी
किरपेचं दान् द्यावं जी
हे यावं जी
किरपेचं दान् द्यावं जीऽऽऽऽ ,  हे !




ईश्वरा जन्म हा दिला 
प्रसवली कला, थोर उपकार
तुज चरणी लागली वर्णी
कशी ही करणी करू साकार

मांडला नवा संसार आता
घरदार तुझा दरबार

पेटला असा अंगार
कलेचा ज्वार चढवितो झिंग

नटरंग उभा, ललकारी नभा,
स्वरताल जाहले दंग (२)




हे, कडकड कडकड बोल बोलती 
हुंगर ही तालाची
अरं, छुमछुम छन् नन् साथ तिला 
या घुंगराच्या बोलाची
जमवून असा स्वरसाज मांडतो
हीच इनंती यावं जी


किरपेचं दान: द्यावं जी
हे यावं जी
किरपेचं दान् द्यावं जी
हे यावं जी
किरपेचं दान् द्यावं जीऽऽऽऽ ,  हे !